जीएसटी

CGST अधिनियम में किए गए नवीनतम संशोधन :

CGST अधिनियम यानी के “सेन्ट्रल गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स (सीजीएसटी) अधिनियम”, यह वो शब्द है जो हाल में देश में चर्चा का केंद्र बना हुआ हैं। अब तक केवल जीएसटी यानी के गुड्स एंड सर्विसेज टैक्स के बारे में हीं बातचीत हुई है। जीएसटी की तरह सीजीएसटी में आए
नवीनतम संशोधनों के बारे में भी जानना भी महत्वपूर्ण है।

व्यापारी और उपभोक्ता दोनों ही अभी भी इस नए कर व्यवस्था को समझने के लिए जूझ रहे हैं। सीजीएसटी की इस नई अवधारणा शुरूआत परिस्थितियों में समजना मुश्किल हो सकती है।

वित्त वर्ष 2019-2020 के लिए लागू होने जा रहा सीजीएसटी को आसानी से समझने के लिए यह लेख आपकी सहायता करेगा। छोटे व्यवसाय मालिकों से लेकर उपभोक्ताओं तक, यह उन सभी के लिए है जिनको सीजीएसटी अधिनियम और इसके नवीनतम संशोधन समझने की आवश्यकता है ।

CGST एक्ट को समझना :

यह कोई नया एक्ट नहीं है। आम बोलचाल में जीएसटी जो की अप्रैल 2017 में शुरू हुई एक नई अप्रत्यक्ष कर व्यवस्था है। दो संसदीय अधिनियम इस नई कर प्रणाली का आधार बनते हैं – IGST अधिनियम और CGST अधिनियम।

आईजीएसटी अधिनियम Integrated Goods and Services Tax अधिनियम के लिए है और CGST अधिनियम Central Goods and Services Tax अधिनियम के लिए है। IGST उन वस्तुओं और सेवाओं पर लागू होता है जो एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं। केंद्र और राज्य सरकार IGST के माध्यम से एकत्रित हुए रकम को साझा करते हैं।

दूसरी ओर, सीजीएसटी उस कर को संदर्भित करता है जो राज्य के भीतर वस्तुओं और सेवाओं की आवाजाही पर लगाता है। यह कर भी 2017 से चलन में है।

सीजीएसटी अधिनियम में अप्रैल 2019 से कुछ संशोधन पेश किए गए हैं, यही कारण है कि सीजीएसटी की चर्चा जीएसटी से अलग होकर उभरी है।

CGST में बदलाव :

CGST 2019 अधिनियम में संशोधन निम्नलिखित क्षेत्रों से संबंधित हैं :

• पंजीकरण सीमा
• योजना स्कीम थ्रेशोल्ड
• रूपये 50 लाख तक के वार्षिक कारोबार के लिए नई योजना
• सप्लायर को भुगतान का तरीका
• फाइल रिटर्न दाखिल करने का तरीका
• टैक्स और ब्याज का भुगतान
• विविध मामले

पंजीकरण थ्रेसहोल्ड :

जीएसटी पंजीकरण में वस्तुओं और सेवाओं दोनों की सप्लाई मार्च 2019 तक सालाना 20 लाख थी। केवल राज्य के अंदर काम करने वाले और सालाना 20 लाख से अधिक का कारोबार हो तो ही उन्हे जीएसटी में पंजीकरण करना था।

अब यह सीमा वित्त वर्ष 2019-2020 के लिए 40 लाख रुपये तक की कर दी है लेकीन सिर्फ माल के लिए। इस वित्तीय वर्ष के लिए 40 लाख रूपये तक के वार्षिक कारोबार वाले माल सप्लायर को अब GST पंजीकरण से छूट दी गई है।

यह बदलाव विशेष राज्यों जैसे की अरुणाचल प्रदेश, मणिपुर, मेघालय, मिजोरम, नागालैंड, सिक्किम, तेलंगाना, त्रिपुरा और उत्तराखंड को छोड़कर
के पूरे देश में मान्य है। यह बदलाव केंद्रशासित प्रदेश पोडुंचेरी पर भी लागू नहीं होगा। इन राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों की सीमा में कोई बदलाव नहीं है यानी के 10 लाख रूपये ही रखी गई है।

यह ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि वित्तीय वर्ष 2019-2020 के लिए सेवाओं के पंजीकरण के लिए सीमा 20 लाख रूपये पर अपरिवर्तित रखा है। इसके अलावा, जहां IGST लागू है वहां अंतरराज्यीय में माल सप्लाई पर लागू नहीं है।

सीजीएसटी की धारा 24 के तहत चिन्हित किए गए सप्लायर के साथ ऑनलाइन विक्रेता की सीमा में भी कोई बदलाव नहीं किया गया। आइसक्रीम या किसी अन्य प्रकार के खाद्य बर्फ के सप्लायर की सीमा भी बरकरार रखी गई हैं।

संशोधनों में एक नई उपधारा आधार कार्ड वेरिफिकेशन को अनिवार्य बनाती है। इसभाग में आधार कार्ड प्रमाणीकरण के लिए प्रक्रिया का वर्णन भी किया गया है। कंपनी के महत्वपूर्ण कर्मियों जैसे कि सीईओ, एमडी आदि का आधार कार्ड वेरिफिकेशन भी अनिवार्य है।

संरचना योजना थ्रेसहोल्ड :

सीजीएसटी अधिनियम के तहत संरचना योजना सरल दर के साथ माल और सेवा के प्रदाताओं के लिए तिमाही भुगतान पंजीकरण के लिए एक अच्छा विकल्प है। 2019 के संशोधनों ने इस योजना के लिए सीमा में भी बदलाव किए हैं।

1 करोड़ रूपये वार्षिक टर्नओवर के बजाय, अब सीमा बढाकर 1.5 करोड़ रूपये कर दी गई है। नई सीमा व्यापारियों, निर्माताओं और रेस्तरां सेवा प्रदाताओं के लिए ही लागू है।

व्यापारियों और निर्माताओं को 1% की दर से CGST का भुगतान करना होगा। रेस्तरां सेवा प्रदाताओं के लिए कर की दर 5% है।

सालाना 50 लाख कारोबार वाले नये व्यवसाय के योजना :

संशोधनों में मिश्रित सप्लायर यानी की जो सामान और सेवा दोनों ही प्रदान करते हैं उनके लिए एक नया सैक्शन भी जोड़ा गया है। यह मिश्रित सप्लायर जो की
अंतर-राज्य सप्लाई में शामिल नहीं है वे संरचना योजना के लिए आवेदन कर सकते हैं। इस लिए पिछले वित्त वर्ष के दौरान 50 लाख रुपये से अधिक कनहा कारोबार नही होना चाहिए।

इस तरह के मिश्रित सप्लायर को 6% कर,
केंद्र (CGST) द्वारा लगाए गए 3% और राज्य (SGST) द्वारा लगाए गए 3% कर का भुगतान करना होगा। वित्तीय सेवाएं जैसे लोन और डिपोजीट की सीमा बढाई गई है और उनसे प्राप्त होने वाला ब्याज सीमा के बाहर रहेगा। संशोधनों में एक नई उपधारा इन सभी बातों को स्पष्ट करती है।

संशोधित संरचना योजना में कुछ नियम और शर्तें जुड़ी हुई हैं। यह माहिती ज्यादातर शब्दावली से संबंधित हैं।

सप्लायर को भुगतान करने का तरीका :

एक नया उपधारा कुछ पंजीकृत सप्लायर को अपने प्राप्तकर्ता को इलेक्ट्रॉनिक रूप से भुगतान करने की सवलत देता है। लेकिन ऐसे सप्लायर को ई-भुगतान शुल्क वहन करने की आवश्यकता नहीं है।

टीसीएस प्रावधान :

टीसीएस मतलब टैक्स कलेक्टेड एट सोर्स। पहले, TCS राशि को GST गणना में शामिल किया गया था। लेकिन संशोधनों के अनुसार, अब यह राशि जीएसटी गणना में शामिल नहीं की जाएगी।

एक सरल उदाहरण के जरिए समझते है… माना लिजिए कि सप्लाई की गई वस्तुओं का कुल मूल्य 4,00,000 रूपये है। तो इस पर TCS @ 1% यानी के 4,000 रूपये होगा। यह कुल 4,04,000 रुपये होगा। पहले, GST की गणना इस कुल मूल्य के 3% पर की जाती थी। अगर ऐसा होता तो यह12,120 रूपये होता। तो कुल राशि 4,00,000 रूपये + 4,000 + GST ​​12,120 = 4,16,120 रूपये हो जाती।

संशोधनों के बाद कुल राशि 4,00,000 रूपये + (GST @ 3% केवल मूल) 12,000 = 4,12,000 रूपये होगी।

रिटर्न फाइलिंग :

2019 संशोधनों ने जटिल फाइलिंग प्रक्रिया को कम करने के लिए इस सैक्शन में कुछ सकारात्मक बदलाव किए हैं। कुछ करदाताओं के पास अब मासिक के बजाय तिमाही रिटर्न दाखिल करने का विकल्प है। लेकिन करों का भुगतान अभी भी हर महीने करना पड़ता है।

कंपोजिशन स्कीम के तहत पंजीकृत लोगों के लिए अब तिमाही के बजाय सालाना रिटर्न दाखिल करना संभव है। लेकिन कर का भुगतान तिमाही आधार पर जारी रहेगा।

कर और ब्याज भुगतान :

यदि कोई करदाता गलत शीर्षक के तहत इलेक्ट्रॉनिक रूप से कर, जुर्माना या ब्याज का भुगतान करता है, तो अब राशि को सही जगह पर स्थानांतरित करना संभव है। इससे पहले राशि यानी की रकम खो जाती थी।

संशोधनों के मुताबिक अब ब्याज केवल विलंबित भुगतान की स्थिति में, इलेक्ट्रॉनिक रूप से भुगतान की गई राशि के बराबर होगा। इससे पहले, करदाताओं को पूरी राशि पर ब्याज देना पड़ता था।

विविध :

2019 जीएसटी संशोधनों ने राष्ट्रीय मुनाफाखोरी-प्रतिरोधी प्राधिकरण में सकारात्मक बदलाव किए है।
अब मुनाफाखोरी की राशि का 10% तक जुर्माना लगाया जा सकता हैं। यह सुनिश्चित करना है कि मूल्य में कमी के माध्यम से को इनपुट टैक्स ट्रिकल का लाभ दिया जाए।